समाचार शगुन उत्तराखंड
पहली कुमाउनी पत्रिका अचल के संपादक जीवन चंद्र जोशी को आज उनकी 125 वीं जयंती पर याद किया गया। दुदबोली की ओर से पर्वतीय सभा लखनपुर में हुए कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रोफेसर गिरीश चंद्र पंत ने कहा 1938-40 में अल्मोड़ा से कुमाउंनी की पहली पत्रिका ‘अचल’ का दो वर्ष तक सम्पादन-प्रकाशन करके इतिहास रचने वाले जीवन चंद्र जोशी जी की आज 125वीं जयंती है। उनका जन्म 23 अगस्त 1901 को हुआ था। ‘अचल’ को प्रकाशित हुए भी 88 वर्ष हो चुके हैं और आज भी वह कुमाउंनी पत्रिकाओं के लिए आदर्श और मानक बना हुआ है।1937 में कुमाउंनी भाषा में नियमित मासिक पत्रिका के सम्पादन-प्रकाशन का निर्णय करना निश्चय ही साहसिक था। बहुत सारे परिचितों को चिट्ठियां लिखी गईं कि कुमाउंनी में कविता, कहानी, लेख, वगैरह लिखो। बाल-सखाओं सुमित्रानंदन पंत, गोविंद बल्लभ पंत, इलाचंद्र जोशी, आदि को कई-कई पत्र लिखे गए कि कुमाउंनी में रचनाएं भेजो। गोविंद बल्लभ पंत को यह भी लिखा गया– “यार, अपनी नक्काशी भी दिखाओ। अब वक्त आ गया है।” पंत जी स्कूली दिनों से ही चित्रकारी भी किया करते थे। सो, उनसे ‘अचल’ का मुखपृष्ठ बनाने के लिए कहा गया। प्रवेशांक के लिए उन्होंने जो आमुख तैयार किया उसमें पर्वत श्रंखलाएं, ध्रुव तारा (‘अचल’ नाम के प्रतीक), पेड़, नदी, आदि चित्रित किए। उन्होंने दो चित्र बनाए- एक, मुख्य आवरण के लिए। दूसरा आवरण के भीतर के पेज के लिए। पूर्व प्रधानाचार्य अशोक जोशी ने कहा कि जीवन जोशी ने अचल’ के वास्ते खूब तैयारी की। उन्होंने रवींद्रनाथ (ठाकुर) टैगोर और हिमालय के अद्भुत चित्रकार निकोलस रोरिक तक को अपनी योजना के बारे में लिखा और सुझाव मांगे। रोरिक के साथ उनके सम्पर्क पहले से थे। टैगोर से तो उनका बांग्ला में पत्र-व्यवहार होता था। दोनों ने ही अपने संदेश भेजकर में योजना का स्वागत करते हुए उनका मनोबल बढ़ाया। कुमाउंनी में लिखने वाले बहुत कम थे। कुछ रचनाएं आईं, कुछ उन्होंने पीछे पड-पड़ कर लिखवाईं। फिर भी सामग्री का संकट हुआ तो जोशी जी और तारा दत्त पाण्डे ने भी अलग-अलग नामों से कई लेख, कहानियां, व्यंग्य, समीक्षाएं, आदि लिखे। इस तरह ‘अचल’ का प्रवेशांक फरवरी 1938 में प्रकाशित हुआ। वास्तव में, उसे ‘प्रवेशांक’ नहीं कहा गया था। ‘वर्ष’ और ‘अंक’ लिखने की परम्परा निभाने की बजाय सर्वथा नया प्रयोग किया गया। कुमाउनी कवि निखिलेश उपाध्याय ने कहा अचल के पहले दो ‘शृंग’ प्रकाशित होने के बाद अल्मोड़ा के इंदिरा प्रेस से छपे इसके बाद के अंक नैनीताल के ‘किंग्स प्रेस’ से छपे.धीरे-धीर लेखक बिरादरी अचल के साथ जुटती गयी. श्यामाचरणदत्त पंत, जयंती पंत, रामदत्त पंत, भोलादत्त पंत ‘भोला’, बचीराम पंत, दुर्गादत्त पाण्डे, त्रिभुवनकुमार पाण्डे, आदि–आदि की बड़ी टीम बन गयी. ‘अचल’ में पहाड़ के उस समय के अखबारों की समीक्षाएं भी प्रकाशित होती.प्रख्यात रूसी चित्रकार निकोलाई रोरिख के हिमालय सम्बंधी लेखों का कुमाऊंनी अनुवाद भी उसमें प्रकाशित किया गया। ठीक दो साल बाद जनवरी,1940 का अंक अंतिम साबित हुआ, क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ जाने से कागज मिलना मुश्किल हो गया था. समाज का सहयोग भी निराशाजनक था. फरवरी 1938 से जनवरी 1940 तक दो वर्षों में, श्रेणी-एक के तहत बारह एवं श्रेणी-दो के तहत बारह, कुल में 24 शृंग (अंक) प्रकाशित हुए. इनमें सम्भवत: दो शृंग संयुक्तांक के रूप में निकालने पड़े थे.जीवन चंद्र जोशी जी की प्रेरणा से ही सुमित्रानंदन पंत ने अपनी अपनी एकमात्र कुमाउनी कविता बुरांश लिखी। इस मौके पर प्रो गिरीश चंद्र पंत,अशोक जोशी,निखिलेश उपाध्याय,सी पी खाती,भुवन पपनै,नवेंदु मठपाल,हेमंत कुमार,खीम सिंह रजवार,नंदराम आर्य
