समाचार शगुन उत्तराखंड
उत्तराखंडी लोकभाषाओं के भविष्य पर भी हुई चर्चा…
साहित्य अकादमी।पुरस्कार प्राप्त कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की 85 वीं जयंती के अवसर पर एक स्थानीय रेस्टोरेंट में भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस मौके पर
पिथौरागढ़ से निकलने वाली कुमाउनी मासिक पत्रिका
आदलि कुशलि की संपादक डा सरस्वती कोहली को पांचवां मथुरादत्त मठपाल स्मृति साहित्य पुरस्कार प्रदान किया गया।इसके साथ उत्तराखंडी लोकभाषाओं
के भविष्य पर भी उत्तराखंड भर से आए साहित्यकारों ने बातचीत की।कार्यक्रम की शुरुआत शिक्षक डॉ धर्मेंद्र नेगी एवं हरीश आर्य “हरीमन” द्वारा मथुरादत्त मठपाल की कविताओं की संगीतमय प्रस्तुति से हुई। तत्पश्चात प्रो गिरीश चंद्र पंत द्वारा अतिथियों का स्वागत किया गया दुदबोली के संपादक चारु तिवारी ने डॉ सरस्वती कोहली के जीवन,साहित्य कर्म पर बातचीत रखी।फिर डा कोहली को शाल ओढ़ाकर,प्रशस्ति पत्र,मोमेंटो प्रदान कर सम्मानित किया गया। पहरू संस्था की ओर से भुवन पपने को भी सम्मानित किया गया।दुदबोली के नवीनतम अंक का विमोचन भी किया गया।
उत्तराखंडी लोकभाषाओं के भविष्य पर प्रो प्रभा पंत,जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष जहूर आलम,महासचिव मनोज सिंह,जगमोहन रौतेला,मदन चमोली,गजेंद्र बटोही,हयात सिंह रावत,नवेंदु मठपाल ने बातचीत रखी। वक्ताओं का मत था कि लोकभाषाओं को बचाने के लिए उनके हमें अपने अपने घरों में बोलना होगा।कार्यक्रम में निम्न प्रस्ताव पारित किए गए..
प्रस्ताव: 1
उत्तराखंड की प्रमुख भाषाओं कुमाउनी-गढ़वाली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की संस्तुति यह सदन करता है। यह सदन सरकार से मांग करता है कि लंबे समय से चली आ रही इस मांग को सरकार प्राथमिकता में रखे। नई शिक्षा नीति में जब लोकभाषाओं को महत्व दिया जा रहा है तो यह जरूरी है कि उन लोकभाषाओं को संवैधानिक मान्यता मिलनी चाहिए जो अभी जीवंत हैं जिनमें साहित्य लिखा जा रहा, लोग अपनी भाषाएं बोल रहे हैं। हम उत्तराखंड सरकार से मांग करते हैं कि सरकार विधानसभा में कुमाउनी-गढवाली भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजे। हम राजनीतिक दलों से भी अनुरोध करते हैं कि वे अपने चुनावी घोषणापत्र में शामिल करें।
प्रस्ताव: 2
सदन इस बात पर अपनी सहमति देती है कि इस समय प्रदेश में चल रही जनगणना में लोग भाषा वाले कालम में अपनी भाषा कुमाउनी और गढ़वाली दर्ज करायें। प्रवास में रह रहे लोग भी अपने गांव में जनगणना में नाम दर्ज करायें और भाषा कुमाउनी और गढ़वाली दर्ज करायें।
प्रस्ताव: 3
लोकभाषाओं पर साहित्य सृजन करने वाले साहित्यकार, जिनकी आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं उनके लिए सरकार एक कोश की स्थापना करे। देखा गया है कि कई साहित्यकार आर्धिक अभावों में कभी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
प्रस्ताव: 4 यह सदन प्रस्ताव पास करता है कि हमारी लोक भाषाओं में कुमाउनी और गढ़वाली भाषाओं को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाय। हेमंत कुमार द्वारा संपादित पुस्तक कविता संग्रह का नाम ‘हिमवंत एक लोक साझी बज़्म’ का भी विमोचन किया गया। वरिष्ठ कवि जगदीश जोशी की अध्यक्षता ,निखिलेश उपाध्याय के संचालन में हुए कार्यक्रम में नंदिनी मठपाल,हिमांशु पांडे मित्र,सुमित कुमार, अशोक जोशी,नंदराम आर्य, सुमन जोशी, रितु बेलवाल,वंदना,एस पी मिश्रा,अनुपम शुक्ला,सी पी खाती, डा पुष्पेंदु मठपाल,हरिमोहन मोहन,नवीन तिवारी,सुभाष गोला,नवेंदु जोशी,,राजा राम विद्यार्थी,प्रकाश फुलोरिया,दिनेश रावत,पुष्पा मठपाल,बसंत बर्मा,जितेंद्र बिष्ट,देवेंद्र भट्ट मौजूद रहे।



