ढेला के बच्चों ने जानी ओडिसी नृत्य की बारीकियां

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समाचार शगुन  उत्तराखंड 

 

रामनगर के राजकीय इंटर कालेज ढेला के बच्चों ने आज ओडिसी नृत्य की प्रसिद्ध नृत्यांगना प्रज्ञा घोष से ओडिसी नृत्य की बारीकियां सीखी। स्पीक मैके संस्था की पहल पर हुए इस कार्यक्रम की शुरुआत में प्रज्ञा घोष ने ओडिसी नृत्य के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यह भारत के सबसे पुराने जीवित नृत्य रूपों में से एक है, जिसकी जड़ें ओडिशा के प्राचीन मंदिरों से जुड़ी हैं। इसकी शुरुआत मंदिरों में नृत्य करने वाली महारी (देवदासी) परंपरा से हुई थी। बाद में किशोर लड़कों ने लड़कियों का वेश धरकर गोतिपुआ शैली के रूप में इसे आगे बढ़ाया।20वीं शताब्दी के मध्य में गुरु केलुचरण महापात्र और संयुक्ता पाणिग्रही जैसे दिग्गजों ने इस कला का फिर से विस्तार किया। इसकी मुद्राएँ मंदिर की मूर्तियों जैसी प्रतीत होती हैं, इसलिए इसे ‘चलती-फिरती वास्तुकला’ भी कहते हैं।यह नृत्य मुख्य रूप से भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम व भक्ति भाव पर आधारित होता है। इसके प्रदर्शन में मंगलाचरण, नृत्य, नाट्य और मोक्ष जैसे चरण शामिल होते हैं। फिर प्रज्ञा द्वारा नमामि मंगलाचरण कर गणेश स्तुति प्रस्तुत की गई। मधुराष्टकम कर उन्होंने कृष्ण की बाल लीलाओं की शानदार प्रस्तुति की। उनके द्वारा बच्चों को ओडिसी नृत्य के पहले चरण के रूप में भूमि प्रणाम सिखाया।ओडिसी नृत्य में भूमि प्रणाम धरती माता के प्रति कृतज्ञता, सम्मान और विनम्रता व्यक्त करने की एक पवित्र और अनिवार्य क्रिया है।इसके साथ ही ओडिसी नृत्य में भंगिमाओं के महत्व की जानकारी देते हुए उनको भी सिखाया।विद्यालय की ओर से उनको स्मृति चिन्ह दे सम्मानित किया गया। इस मौके पर इस मौके पर प्रधानाचार्य हरीश कुमार,नवेंदु मठपाल,महेंद्र आर्य, दिनेश निखुरपा,नरेश कुमार,निधि हर्ष, जया बाफिला, उषा पवार, शमा अंसारी,संजीव कुमार, पदमा, स्पीक मैके के मंजू निगलटिया ,दीपक कफलटिया,गोपाल दत्त मौजूद रहे।