समाचार शगुन उत्तराखंड
रचनात्मक शिक्षक मंडल की पहल पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस आवासीय छात्रावास हल्दूचौड़ के
बच्चों ने दो दिवसीय बाल फिल्म समारोह के दूसरे दिन बाल मनोविज्ञान पर आधारित देश विदेश की फिल्मों के साथ साथ पर्यावरणीय चेतनाप्रद फिल्में देखीं।
कार्यक्रम की शुरुआत में फिल्म समारोह संयोजक नवेंदु मठपाल ने बच्चों को भारतीय सिनेमा के इतिहास की जानकारी दी। बच्चों द्वारा आज इकतारा समूह की फिल्म चंदा के जूते देखी गई।इस फिल्म में गरीब परिवार से वास्ता रखने वाली एक ऐसी लड़की की कहानी को दिखाया गया है जिसे एक ऐसे स्कूल में भर्ती कर दिया गया जहां जूते पहनना अनिवार्य है पर लड़की को यह मंजूर नहीं।फिल्म वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की विसंगतियों को बहुत ही बेहतरीन तरीके से सामने लाती है।
बच्चों ने ईरानी फिल्मकार माजिद मजीदी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘चिल्ड्रन ऑफ हेवन’ भी देखी।इसमें एक गरीब भाई अपनी बहन के खोए हुए जूतों की भरपाई करने के लिए दौड़ प्रतियोगिता में तीसरे स्थान पर आने की कोशिश करता है, क्योंकि तीसरा इनाम जूतों की एक नई जोड़ी होती है।यह ऑस्कर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए नामांकित होने वाली पहली ईरानी फिल्म थी।
बच्चों द्वारा प्लास्टिक के दुष्प्रभाव को बताती पर्यावरण डॉक्यूमेंट्री फिल्म “अल्बाट्रॉस” भी देखी गई ।इसे प्रसिद्ध फोटोग्राफर और फिल्मकार क्रिस जॉर्डन ने बनाया है। यह फिल्म प्रशांत महासागर में स्थित मिडवे एटोल के सुदूर द्वीप पर रहने वाले अल्बाट्रॉस पक्षियों की हृदयविदारक कहानी दिखाती है।फिल्म में विशाल प्रशांत कचरा पेच से माता-पिता पक्षी
अल्बाट्रॉस अनजाने में समुद्र में तैरते हुए प्लास्टिक को भोजन समझकर अपने बच्चों को खिला देते हैं।जिससे द्वीप पर हज़ारों की संख्या में मृत चूजों के कंकाल पाए जाते हैं, जिनके पेट पूरी तरह से प्लास्टिक के ढक्कन, लाइटर और अन्य कचरे से भरे होते है। प्रभाव: पेट में प्लास्टिक भर जाने के कारण चूजों को पोषण नहीं मिल पाता और वे भूख या पेट फटने से दम तोड़ देते है।इस फिल्म ने वैश्विक स्तर पर प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या को लोगों के सामने व्यक्तिगत और भावनात्मक रूप से रखा।
इस मौके पर हॉस्टल वार्डन हिमांशु पांडे,प्रशासनिक अधिकारी कैलाश चंद्र सिंह,महेश चंद्र जोशी,मोहित सिंह,विजय राज,भावना मेहता,मंजू मिश्रा,ममता शर्मा मौजूद रहे।



