कुमाउंनी कवि मथुरादत्त मठपाल की पांचवीं पुण्यतिथि पर मालधनचौड़ महाविद्यालय में उनके साहित्य पर हुई चर्चा

समाचार शगुन हल्द्वानी उत्तराखंड …

साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कुमाउंनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पांचवीं पुण्य तिथि पर दो दिवसीय कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत राजकीय महाविद्यालय मालधनचौड़ में हुई।कार्यक्रम के पहले दिन विद्वतजनों द्वारा श्री मठपाल के साहित्य कर्म पर व्यापक चर्चा करने के साथ साथ उत्तराखंडी चिनाण पछयाण को रेखांकित करने वाली पत्रिका दुदबोलि के नवीनतम अंक का विमोचन भी किया गया‌ कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्य प्रो.सुशीला सूद द्वारा की गई।श्री मठपाल के साहित्य पर बोलते हुए श्रीमती सूद कहा मठपाल जी ने पहले हिन्दी में साहित्य रचना शुरू की. उन्होंने हिन्दी में बहुत सी रचनाएं रचीं. सन् 1985 से कुमाउनी साहित्य रचना शुरू की. उनकी पहचान कुमाउनी के बड़ी कवियों से होने लगी तो उनको लगा कि मातृबोली (कुमाउनी) ही अपने हृदय के भावों को वाणी प्रदान करने के लिए सबसे अच्छा माध्यम है. कवि सम्मेलनों से उनकी पहचान कुमाउनी साहित्यकारों से बढी. वर्ष 1997 में नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर वे पूर्णत: कुमाऊनी साहित्य सेवा में जुट गए। मठपाल ने कुमाउनी साहित्यि सेवा के लिए शुरूआत में दो काम किये पहला कुमाउनी में लिखना शुरू किया. दूसरा सन 2000 से उन्होंने ‘दुदबोलि’ पत्रिका निकालनी शुरू की. आरम्भ में दुदबोलि 60 पृष्ठों में निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका थी. इसके 24 अंकों के हजारों पृष्ठों में कुमाऊनी गीत/कविता कथाएं/ साहित्य प्रकाशित हुआ. सन् 2006 से यह पत्रिका करीब 350 पन्नों की वार्षिकी बनकर निकलने लगी. जिसमें 2700 से अधिक पृष्ठों में कुमाउनी, नेपाली, गढ़वाली लोकसाहित्य को स्थान मिला है। हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो गिरीश चंद्र पंत ने कहा कि रामगंगा से उनको बहुत प्रेम था. इसीलिए उन्होंने लम्बी कविता ‘चली रहप गंग हो’ रामगंगा पर रची. अपने प्रकाशन का नाम भी रामगंगा प्रकाशन रखा. जहाँ से लगभग 20-22 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. ध्यान देने की बात यह है कि इन सारे साहित्यिक कार्यों के लिए मठपाल जी ने कभी भी सरकारी सहायता की ओर नहीं देखा। मठपाल ने सन 1989- 90 और 91 में 3 क्षेत्रीय भाषायी सम्मेलन अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और नैनीताल में आयोजित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. दूर-दूर से कुमाऊनी भाषा प्रेमियों ने इस सम्मेलन में आकर प्रतिभाग किया। अपनी मातृबोली के लिए लोगों के हृदय में कुछ करने की भावना जगी. पूरे कुमाऊँ में मठपाल जी ने दर्जनों कवि सम्मेलन को आयोजित कराने में सहयोग किया. रामनगर में उन्होंने ‘बसंती काव्य समारोह’ नाम से सात कवि सम्मेलनों का आयोजन किया। इस मौके पर दुदबोली पत्रिका के नवीनतम अंक का विमोचन भी किया गया। पत्रिका के संपादक चारु तिवारी ने जानकारी दी कि ‘दुदबोलि’ के इस वार्षिक अंक को उत्तराखंड की लोक विधाओं पर केंद्रित किया गया है। इस अंक को ‘हमरि लोक-थात’ शीर्षक दिया है। कुमाउंनी, गढ़वाली, जौनसारी के साहित्य, संगीत, कला, रंगमंच, सिनेमा में जितनी भी विधाओं में काम हुआ है उसे इस अंक में शामिल किया गया है। इस अंक में उत्तराखंड की परंपरागत लोकविधाओं पर अलग-अलग लगभग बीस महत्वपूर्ण आलेख हैं। उत्तराखंड में प्रचलित झोड़ा, चांचरी, भगनौल, बैर, बाजुबंद, न्यौली, झुमैलो जैसी लोकगीत-नृत्यों के अलावा यहां की पांडव और जागर शैली की लोक गायन विधा पर लेख हैं। रामलीला, होली, दीपावली किस तरह से यहां के लोक बिंबों और प्रतीकों से लोक विधाओं को समृद्ध करती है, उन पर शोधपरक लेख शामिल हैं। इस मौके पर डॉ.प्रियदर्शन द्वारा गढ़वाली में मठपाल के साहित्य पर प्रकाश डाला, डॉ.पीके निश्चल, डा.प्रदीप चंद ने भी बताचीत रखी। निधि अधिकारी द्वारा बाघ बकरी खेल,आंचल,विशाल मोनिका,डिंपल द्वारा मठपाल की कविताओं का पाठ किया गया। इस मौके पर नवीन तिवारी, निखिलेश उपाध्याय, सीपी खाती,नवेंदु मठपाल, डॉ.पीके निश्छल, प्रिय दर्शन, डॉ.निधि अधिकारी, प्रदीप चंद्र, दीपा पांडेय, भुवन पपने मौजूद रहे।

 

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