घुघुती त्यार के दो दिवसीय कार्यक्रम के दूसरे दिन मनाया गया घुघुती त्यार, कुली बेगार आंदोलन पर भी हुई चर्चा

समाचार शगुन उत्तराखंड 

जोतिबाफुले सावित्रीबाईफुले सायंकालीन स्कूल की पहल पर सांवल्दे (पश्चिम), रामनगर में दो दिवसीय‌घुघुती त्यार कार्यक्रम के दूसरे दिन आज घुघुती त्यार के साथ साथ कुली बेगार आंदोलन पर भी चर्चा हुई। इस मौके पर बोलते हुए प्रो गिरीश चंद्र पंत ने कहा घुघुती त्यार एक ऐसा उत्सव जहाँ प्रकृति, संस्कृति और लोक जीवन का ताना बाना एक साथ बुना जाता है।उन्होंने इस मौके पर प्रचलित लोक कथाओं के बारे में बताया। हमारे यहां परंपराऐं किताबों में नहीं लिखी जाती, बल्कि वे पक्षियों के गीतों में गूँजती हैं, वनों की ध्वनियों में सुनाई देती हैं और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपी जाती है। आज जरूरत है कि हम सब मिलकर अपनी विरासत का उत्सव मनाएं, संरक्षण पर संवाद को सशक्त बनाएं, और प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीवन जीने की सामाजिक धरोहर को पुनः जागृत करें। कुली बेगार आंदोलन पर बोलते हुए रितु बेलवाल ने कहा आज का दिन घुघुतिया त्यार को मनाने के साथ साथ रक्तहीन क्रांति जिसको इतिहास में कुली बेगार प्रथा कहा गया के संग्रा लमियों को भी याद करने का दिन भी है। यह दिन हम सब के लिए ऐतिहासिक दिन है. इसी दिन 1921 में बागेश्वर के उत्तरायणी के मेले में कुमाऊँ केसरी बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में कुली-बेगार के रजिस्टरों को सरयू में बहा दिया गया था.
कुली बेगार प्रथा आम लोगों को अंग्रेजों के लिए बिना किसी भाड़े के जबरन कुली बनाने के प्रथा थी.अंग्रेज अफसर के इलाके के दौरे पर आने पर पधान और पटवारी का जिम्मा होता था कि वह अंग्रेजों के लिए मुफ्त के कुली उपलब्ध करवाये। इस शोषणकारी प्रथा के विरुद्ध कुमाऊँ में लड़ाई के नेता बद्री दत्त पांडे थे और गढ़वाल में अनुसूया प्रसाद बहुगुणा लड़ाई के नेता थे। अंग्रेजी राज में इस उत्पीड़नकारी प्रथा को सरयू बगड़ में बहा देने वाले संग्रामियों को भी हमें याद ही रखना होगा। इस मौके पर ग्राम प्रधान धरम सिंह,तुलसी बेलवाल,तुलसी जोशी,महेश जोशी, रितु बेलवाल,लवी बेलवाल,गंगा बोहरा,शांति देवी,पुष्पा बेलवाल,चंपा बेलवाल,मंजू मेहरा,गीता बोहरा,विमला देवी,लक्ष्मी देवी,पार्वती देवी,सुधा मौजूद रहे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here