समाचार शगुन उत्तराखंड

रचनात्मक शिक्षक मंडल की पहल पर पटरानी में चल रहे सावित्रीबाई फुले सायंकालीन स्कूल ने आज अपना तीसरा वार्षिकोत्सव मनाया.इस दौरान रंगारंग कार्यक्रमों के साथ साथ बच्चों की खेलकूद प्रतियोगिताएं भी हुईं। कार्यक्रम की शुरुआत वरिष्ठ रंगकर्मी सफदर को उनके शहादत दिवस पर उनके लिखे गीत पढ़ना लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो के सामूहिक वाचन से हुई.देश की पहली महिला शिक्षिका के रूप में जानी जाने वाली सावित्रीबाई फुले की 195 वीं जयंती की पूर्व संध्या पर हुए कार्यक्रम में बोलते हुए शिक्षक मंडल संयोजक नवेंदु मठपाल ने कहा
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1841 में महात्मा ज्योतिराव फुले से हुआ था। सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं। महात्मा ज्योतिराव को महाराष्ट्र और भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन में एक सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में माना जाता है। उनको महिलाओं और पिछड़े वर्गों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए जाना जाता है। सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और महिलाओ को शिक्षित बनाना। वे एक कवियत्री भी थीं उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था।5 सितंबर 1848 में पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ उन्हों ने महिलाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की। एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी। सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया।उस दौर में उच्च जाति के लोगों द्वारा उनके ऊपर गोबर तक फेंका गया पर वे डिगी नहीं.
10 मार्च 1897 को प्लेग के मरीजों का इलाज करते करते उनका निधन हो गया। रंगारंग कार्यक्रमों में सावित्रीबाई फुले के जीवन पर हिमांशी,नीलम,मेघा,नेहा द्वारा प्रस्तुत नाटक को काफी सराहा गया.प्रतिभागी बच्चों को पुरस्कृत भी किया गया.इस मौके पर नंदराम आर्य,सुभाष गोला,सुमित कुमार,रिंकी,जानकी देवी,हरीश कुमार,तुलसी देवी,चंपा देवी,आरती देवी,भावना, भागुली देवी,रोशनी आदि मौजूद रहे।औ



